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ख़ामोश रहने में दम घुटता है
और बोलने से ज़बां छीलती है
डर लगता है नंगे पाऊँ मुझे
कोई कब्र पाऊं तले हिलती है
परेशान हूँ ज़िन्दगी सेक्या पता कब कहाँ से मारेगी ज़िन्दगी
क्या पता कब कहाँ से मारेगी ज़िन्दगी
बस के मैं, ज़िन्दगी से डरता हूँ
बस के मैं, ज़िन्दगी से डरता हूँ
मौत का क्या है, एक बार मारेगी

धूल उड़ने लगती है जब शाम की
सब कांच भर जाते हैं गर्द से
मैं डरता हूँ, मैं डरता हूँ
दिल जब धड़कने से थकने लगे
नींद आने लगती है तब दर्द से
अनजान हूँ ज़िन्दगी से

क्या पता कब कहाँ से मारेगी ज़िन्दगी
क्या पता कब कहाँ से मारेगी ज़िन्दगी
बस के मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ
बस के मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ
मौत का क्या है
एक बार मारेगी

Added by

Ayushi

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